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अपनी दुनिया बुझी-बुझी

                
                                                         
                            अपने भाग्य का क्या कहना,
                                                                 
                            
सारी खुशियां छूमंतर।
क्यों करता है मानव जाति ,
लड़के-लड़की में अंतर?

क्यों हमें नहीं जीने का हक है,
इस दुनिया में खुशी-खुशी?
क्या भाग्य-विधाता? धत तेरे की!
है अपनी दुनिया बुझी बुझी।।

– संजय कुमार गुप्त ‘अबोध’
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एक घंटा पहले

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