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रास्तों से फिर क्या डरना?

                
                                                         
                            जब इरादा हो शिखर का,
                                                                 
                            
एक पग बस है उछलना।
मौत मंज़िल हो सफ़र जब,
रास्तों से फिर क्या डरना?

आँधियों को रेरना है,
वज्र बनकर झेलना है।
लक्ष्य जब आँखों में हो तो,
अग्निपथ पर खेलना है।

पाँव में छाले पड़ें तो,
पीर हर हँसकर रहेगा।
लक्ष्य से पहले कभी क्या,
हार को स्वीकार लेगा?

काल की हुंकार सुनकर,
वीर कब पीछे है हटता?
जो स्वयं इतिहास रचते,
वे कहाँ भय से है डरता?

श्वास की सीमित डगर पर,
कर्म अमर करके निकलता।
राख हो जाएँ भले ही,
दीप बनकर ही है जलता।

जीत हो या हार ही हो,
रण में है राधेय बनना।
जब स्वयं संकल्प रण हो,
फिर भला किससे मुकरना?

जब इरादा हो शिखर का,
एक पग बस है उछलना।
मौत मंज़िल हो सफ़र जब,
रास्तों से फिर क्या डरना?
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3 घंटे पहले

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