है प्रथम सुअवसर जीवन का मेरा कविता पाठ सुनने का
भाषा के मंच पर प्रस्तुत कर दिल के भावों को दिखाने का
मैं सोचता हूं किन भावों को कविता के रूप में लाऊं मैं
किस पर डालूं प्रकाश यहां किसे सब लोगों को दिखाऊँ मैं
गर भाव प्रदर्शित प्यार क हो सबको मैं स्वयं में समा लूंगा
वसुधैव कुटुंबकम का सपना साकार स्वयं में पा लूंगा
सब कुछ हो जाएगा अपना अपने में सबको पाऊंगा
तेरा मेरा का बंटवारा दुनिया से हटा ले जाऊंगा
सब में ही अपनापन होगा विद्वेष नहीं रह जाएगा
काश्मीर इजराइल फिलिस्तीन का बंटवारा मिट जाएगा
कोई पक्ष न होगा कहीं भारी यूएस यूके चाइना रसिया
प्रेम प्रवाह परस्पर हो सब होंगे परस्पर मन बसिया
उत्तरोत्तर उन्नति संस्कृत की हो नैतिकता को लिए हुए
पूरब पश्चिम की खाई को भरकर के बराबर किए हुए
गतिशील विकास सतत होगा पीढ़ी का फैसला न होगा
सर्वस्व प्रेम में मय होगा इससे तो अलग कुछ ना होगा
अतिशयोक्ति नहीं होगा कहना सबसे ऊपर प्रेम ही है
जीवन में खुशियां लाने का ईश्वर का ऐसा नेम ही है
करता हूं समापन प्रेम से ही कुछ और स्पर्श नहीं होगा
रहे प्यार इस जग में सदा प्रभु से अरदास यही होगा
मंदिर मस्जिद व गुरुद्वारा सब में यह प्यार ही भर जाए
बन जाए स्वर्ग यह वसुंधरा जन्म लेना इस पर तर जाए
हवस व माया की लालच सारे ही दिल से निकल जाए
भाषा हो बस प्रेम की ही सभी लोग इसी में मिल जाएँ
संदीप को है यह स्वप्न दिखा सरकार प्रभु कर दो इसको
साथ रहें सभी सद्भाव सहित इस भावना से भर दो सबको
-संदीप सिंह 'कुँवर'
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