बन रहे हो अमीर
मारकर जमीर को
कब तक सराहोगे
नकली तकदीर को
अंत में पाओगे कुंठा
घुटन पीड़ा आत्मग्लानि
तब लौटने की राह भी
हो जाएगी सुनसान
-कुँवर संदीप सिंह
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