कृतियों का करिश्मा जन्म है
ये कृतियों का करिश्मा बचपन है
कृतियों से हैं बनते किशोर सभी
कृतियों से ही मिलता यौवन है
जिन कृतिकारों की कृतियों से
बनती जग की सारी कृतिका है
हों वृद्ध वो उनका निरादर हो
सचमुच यह पतन चरित्र का है
न खाओ कसम न प्रण करो तुम
स्वीकार करो सच्चाई को
जन्म में स्वागत करते ही हो
कर दो खुशहाल विदाई को
मत करो कहीं कोई भेदभाव
सार्वभौमिक सत्य जहां भी हो
जैसा दोगे वैसा ही पाओगे
रहते तुम चाहे जहां पर हो
-कुँवर संदीप सिंह
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