आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

हिंदी की बिंदी

                
                                                         
                            चलो हिंदी के बिंदी की
                                                                 
                            
चमक तुमको दिखाता हूं
छुपी तस्वीर प्यारी सी
खोलकर सामने लाता हूं
वह तस्वीर जिसको हर
कोई जाने वह पहचाने
ना देखा हो कभी पहले
तो भी अपना उसे माने
इस तस्वीर के रंग में
दिखे सबको ही रंग अपना
इससे मिलने में सबका ही
साकार हो सपना
यह जोड़ती काश्मीर से
कन्याकुमारी को
हर किसी में ही हिंदी
लाती है खुमारी को
जिसे अंग्रेजी कहते हैं
उसे गोरों ने लाया था
वह गोरे थे यह गोरी है
ऐसा भ्रम फैलाया था
इस भ्रम में बहक कर
हैं कुछ हो गए बहरे
अंग्रेजी के दिखावे से ही
हैं चमकाते अपने चेहरे
पर हिंदी सी वैज्ञानिक
नहीं कोई भी भाषा है
जो लिखते हैं वही बोलें
नहीं कोई तमाशा है
अपने को ही अपना मान
अपनेपन से अपनाओ
दिखावे में छोड़ अपना
गैर में फंसाते मत जाओ
नष्ट कर अपनी मर्यादा
कहीं भी हंसते मत जाओ
जो है विस्तार जीवन में
उसे और कसते मत जाओ
सीख लो कितनी भी भाषा
कुँवर हिंदी को रखो दिल में
भरो अनुभूति का आनंद
इस जीवन की महफिल में

- कुँवर संदीप सिंह
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर