चलो हिंदी के बिंदी की
चमक तुमको दिखाता हूं
छुपी तस्वीर प्यारी सी
खोलकर सामने लाता हूं
वह तस्वीर जिसको हर
कोई जाने वह पहचाने
ना देखा हो कभी पहले
तो भी अपना उसे माने
इस तस्वीर के रंग में
दिखे सबको ही रंग अपना
इससे मिलने में सबका ही
साकार हो सपना
यह जोड़ती काश्मीर से
कन्याकुमारी को
हर किसी में ही हिंदी
लाती है खुमारी को
जिसे अंग्रेजी कहते हैं
उसे गोरों ने लाया था
वह गोरे थे यह गोरी है
ऐसा भ्रम फैलाया था
इस भ्रम में बहक कर
हैं कुछ हो गए बहरे
अंग्रेजी के दिखावे से ही
हैं चमकाते अपने चेहरे
पर हिंदी सी वैज्ञानिक
नहीं कोई भी भाषा है
जो लिखते हैं वही बोलें
नहीं कोई तमाशा है
अपने को ही अपना मान
अपनेपन से अपनाओ
दिखावे में छोड़ अपना
गैर में फंसाते मत जाओ
नष्ट कर अपनी मर्यादा
कहीं भी हंसते मत जाओ
जो है विस्तार जीवन में
उसे और कसते मत जाओ
सीख लो कितनी भी भाषा
कुँवर हिंदी को रखो दिल में
भरो अनुभूति का आनंद
इस जीवन की महफिल में
- कुँवर संदीप सिंह
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