"राम तुम क्यो हर साल कागज के रावण पर बाण चलाते हो
जिंदा रावण बहुत पडे़ हैं, चलो पहले उन्हें आग लगाते हैं।
वर्तमान का रावण कोई और नहीं, इकलौता भ्रष्टाचार
दशहरे पर चलो, पहले करे इसका संहार।
कहते तो हैं दशहरा, बुराई पर अच्छाई की है जीत
पर सबके दिल में रावण है बसा, फिर कैसा ये दशहरा और कैसी ये जीत।
स्त्री आज भी है पुराने, खोखले खयालातों से हैरान
कहीं दहेज की लाचारी, तो कहीं खतरे में है सम्मान।
लोग आजकल एक दूसरे से, त्योहारों में बडे़ प्रेम से गले मिल रहे हैं
पर लोभ में डूबे यही लोग, मौका मिलते ही अपनों का ही गला छील रहे हैं।
राम तुम क्यों हर साल कागज के रावण पर बाण चलाते हो
जिंदा रावण बहुत पडे़ हैं, चलो पहले उन्हें आग लगाते हैं।"
- संदीप शिवहरे
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