उलझे सपनों ने अभी तक
न तो कुछ भी सुलझाया,
इन बैरन रातों ने अब तक
न तो उनसे मिलवाया।
इक चादर मैली-सी ओढ़ी
उथले सागर में हो आया,
गहरे गर्तों की परतें खोली
मिला न फिर भी सरमाया।
चलता है देह पर कुछ कृमि-सा
कंपन करता है मन का कोना,
जब अलसाये कोमल किसलय
तब तरुवर सम्मुख क्या रोना?
परिणत-बूँदों की माला ले
भागा था छोटा-सा जलधर,
पर सिमटा-सा उनमें इस लौं
बचा न अस्तित्व रत्ती भर।
स्मृति झंझा बनकर छाई
ले उड़ी सभी थैला भरकर,
ओ विष्किर! अब मुझको भी चुग लो
मैं पड़ा धरणी पर गोधूम बनकर।
मिटने पर भी अमिट रहूँगा फिर भी
देखूँगा उनको कूटस्थ बनकर,
मैं हुआ दलित जो उनसे हर क्षण
रह लेंगे क्या विलग हिस्से भर?
रे हंस! उड़ो अब इस तलैया से
छोड़ो भंगुर-से इन मोतियन को,
घुटता-सा अब ये परिवेश बना
करना क्यूँ अफल यहाँ रतियन को!
मेरा परिवेदन सुनकर मधुकर!
हृदय को मत आकुल करना,
मैं तो सदियों का विकल प्राणी
हाँ! मेरे लिए क्यूँ मन प्राकुल करना!
-सोनू हंस
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