छुपाकर रखते थे जिसको कभी वो सात पर्दो में।।
खुलेआम घूमता है आज कल वो रात सड़को पे।।
निसां यादों के रह जाते है उजड़े दयार में लेकिन,,
अभी तक आँख में रहता हैं वो साथ पलकों पे।।
किसी के प्यार में लिखना यहाँ आसान है लेकिन,,
जिसे दिल से लिखा जाए कहाँ वो बात हर्फ़ों में।।
नज़ारे तो ही अच्छे हैं के जब नूर ए नज़र इक हो,,
वगरना क्या कमी महताब में जो बात सजदों में।।
गुलों के साथ में लिपटी हुई तितली भी अच्छी है,,
मगर उस गुल का क्या जहाँ हो ज़ज्बात शर्तों में।।
बस समझाने में लगा है यां हर कोई इस दिल को,,
किसी को क्या ख़बर क्या है वो एहसास कब्रों में।।
मेरे बारे में क्या छुप छुपके बाते करते रहते हो देव,
छुपा हो ज़हर जिस दिल में नहीं वो साथ पुश्तों में।
-सुनील देव
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