क्या हथेली में छुपा कर रख रहे हो चाँद तुम।।
आस की तस्वीर में बस जड़ रहे हो चाँद तुम।।
जिसको देखे एक मुद्दत हो गई मेरी आँख को,,
लहद की खिड़की में क्यूँ रख रहे हो चाँद तुम।।
बेवज़ह तक़लीफ़ है ये बढ़ती ही चली जाएगी,,
फ़ायदा तो कुछ नहीं जो ढक रहे हो चाँद तुम।।
रोशनी तो आज भर है ये देखना खो जाएगी,,
वक़्त की पुरवाई में क्यूँ रख रहे हो चाँद तुम।।
कोई क्या करता वफाएं सब एक जैसे हैं यहाँ,,
तोड़के ये दिल मेरा क्या तक रहे हो चाँद तुम।।
अब ख़ुशी के मायने समझाना जाके रात को,,
सहर होते ही ख़बरदार कर रहे हो चाँद तुम।।
जो चले गए छोड़ कर भूल जाना तुम भी देव,,
छोटे छोटे मनकों से क्या जप रहे हो चाँद तुम।।
-सुनील देव
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