हमको वफ़ा के मायने समझा रहे हैं वो।।
कई दिन से बुझे दिये को बुझा रहे हैं जो।।
ख़्वाबों की फेहरिस्त इतनी लम्बी हो गई,,
बिस्तर उठा के नींद में चले जा रहे हैं जो।।
काँटो से घिरी हयात में सज़ा रहे है फूल,,
बैठें बिठाए रात भर से उकता रहे हैं जो।।
वादाख़िलाफी रग रग में जिनके थी बसी,,
ज़ख्मों पे अपने मरहम लगवा रहे हैं वो।।
जो लोग तमाम उम्र बस करते रहे गुनाह,,
हमको ही आज आईना दिखा रहे हैं वो।।
जो लोग बुरे वक़्त में आए ना कभी काम,,
'उस्रत पड़ी तो अपने ग़म गिना रहे हैं वो।।
क्या फ़ायदा है बंदगी से ज़िंदगी का देव,,
होके कफ़स में क़ैद बस समझा रहे हैं वो।।
-सुनील देव
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