कोई सच्ची नहीं लगती कोई अच्छी नहीं लगती।।
मोहब्बत नाम की शय है कोई सच्ची नहीं लगती।
लगे हैं दौड़ में सब यां ना जाने गुम कहाँ मंज़िल,,
सभी है भीड़ में अब गली कोई सच्ची नहीं लगती।
कभी तो साथ लगती हैं कभी वो दूर है लगती हैं,
मुक़द्दर में लिखी हर बात कोई सच्ची नहीं लगती।।
गुनाहों की गली में गर शाम हो जाए तो हो जाए,,
रक़ीबों के शहर में शब कोई अच्छी नहीं लगती।।
उसे ही ढूंढता है दिल जिसे हासिल न कर पाया,,
बिन उसके यहां महफ़िल कोई अच्छी नहीं लगती।
सब्र आ जाता मुझे अगरचे दिल भी जल गया होता
इसकी अधजली सूरत ये कोई अच्छी नहीं लगती।
बड़ी आसान लगती थी कभी वो दौर भी था देव,,
जिन्दगी देखी तो अब ये कोई बच्ची नहीं लगती ।।
-सुनील देव
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