चेहरे की बनावट से सब माफ़ नज़र आए।।
कीचड़ जो उछाले थे सब साफ़ नज़र आए।।
क्या करना है दिल का भी शमशान बनाकर,,
जलती हुई बाती में सच ख़्वाब नज़र आए।।
गहरा तो था पानी जब डूबे तो समझ आया,,
समंदर की निगाहों से सब पाक़ नज़र आए।।
निस्बत ना करो सबसे यहाँ कोई नहीं अपना,,
नज़दीक से देखा तो सब साँप नज़र आए।।
ऐसे ना उड़ो ऊपर ज़मीं को ही तरस जाओ,,
देखा है इन आंखों से सब राख नज़र आए।।
रंगों से रंगी दुनियाँ बस दूर से लगती प्यारी,,
बरसात के मौसम में सब खाक़ नज़र आए।।
कहते थे जो हमसे देव हम है तो फ़िक्र कैसी,,
आफ़त जो पड़ी हमपे सब काग नज़र आए।।
-सुनील देव
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X