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राह तकते थे घर के लोग।

                
                                                         
                            बैठे मिलते थे चौखट पर राह तकते थे घर के लोग।।
                                                                 
                            
वो भी क्या दिन थे जब परवाह करते थे घर के लोग।।
वो गाँव गली के गलियारे वो चौपाल के ऊँचे चौबारे,,
चेहरे पे हँसी के मेले और चाह रखते थे घर के लोग।।
देर शाम जब घर से निकले ना आए गर रात तलक,,
आंखों में इक उम्मीद लिए आह भरते थे घर के लोग।।
दरवाज़े की हर आहट पर माँ देखती रहती थी रस्ता,,
जरा देर हुई गर आने में माह तकते थे घर के लोग।।
क्या हाल भए परदेशी का चिठ्ठी के भरोसे रहता थी,,
ख़त आए तो सब को सुना पढ़ा करते थे घर के लोग।।
अब तो यहाँ का हाल यही के सब अपने में ही है गुम,,
पहले जैसे लोग कहाँ जब बाह पकड़े थे घर के लोग।।
अब तो कोई मर भी जाए खुद ही बस जल जाता देव,,
पहले तो जो मर जाता था दाह करते थे घर के लोग।।
-सुनील देव
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2 घंटे पहले

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