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कदमों की थकन देखूँ।

                
                                                         
                            बदन का बोझ देखूँ या कदमों की थकन देखूँ।।
                                                                 
                            
मैं सजदे में रहूँ या अब अपनो की अमन देखूँ।।
कहाँँ मिलती हैं सबसे आदतें भी खानदानी है,,
पुरानी जेब सिलवाऊं या सपनों की पवन देखूँ।।
लथपथ ख़ून में खुशियाँ मिलने आती हैं लेकिन,,
फ़लक का चाँद देखूँ या ग़मों की अंजुमन देखूँ।।
बस दीवार से लगकर पटकती रहती हैं सर को,,
संभालूं ज़िन्दगी को या सदमों की शिकन देखूँ।।
निकल जाता हूँ घर से रोज़ कमाने कागज़ी टुकड़े,,
गिनूं अपनी साँसों को या कपड़ों की फटन देखूँ।।
नहीं 'उस्रत यां मर जाना ये देखा ज़िंदगी में बस,,
छुपाऊं घाव अपने या अब लहरों की फ़तन देखूँ।
हर कोई मिलने आयेगा मगर बाद ए हयात देव,,
उजाले धूप के देखूँ या पलकों की कफ़न देखूँ।।
-सुनील देव
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2 घंटे पहले

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