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प्यारे छूट गए।

                
                                                         
                            क़िस्मत क्या उलझी काँटों से यारे प्यारे छूट गए।।
                                                                 
                            
सहर हुई तो आंखों के सब चाँद सितारें छूट गए।।

आईना भी घर का मुझको तकता अब बेगाना सा,,
सूरत जो धुँधली देखी तो आँख से खारे छूट गए।।

ताज़ा ताज़ा फ़ूल के जैसे महका करता था बचपन
सहराओं की धूप लगी तो चौक चौबारे छूट गए।।

अब तो कोई कुछ भी कह ले चाहे बुरा भला भी,,
बोझ बढ़ा जब से कांधों पर सारे सहारे छूट गए।।

माँ बाबा के आगे ही बस दिल की कर ली अपनी,,
जब से गुज़रे दुनियाँ से वो आ'ला गुज़ारे छूट गए।।

उसको क्या समझाएं जो सुनता ही नहीं अपनी भी
कह सुनकर सब देख लिए नाज़ नज़ारे छूट गए।।

कहानी में क़िरदार निभाया हमनें भी ऐसा इक देव
चलते चलते इक दिन हमसे सारे हमारे छूट गए।।
-सुनील देव
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2 महीने पहले

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