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ना समझे तो क्या समझें।

                
                                                         
                            मुझे अपने तरीके से जो ना समझे तो क्या समझें।
                                                                 
                            
संभल जाओ अभी भी ना संभले तो क्या संभले।।
किसी की याद में क्या दर्द ओ ग़म में डूबे रहते हो,,
निकल जाओ यहाँ से ना निकले तो क्या निकले।।
गुज़र जाना उधर से तुम जहाँ पर ख़ाक़ उड़ती हो,,
आंखों की चुभन देखो के ना समझे तो क्या समझे
क्या ग़ालिब मीर मोमिन के लिखे ही पढ़ते रहते हो
अभी पढ़ना है दुनियाँ को ना समझे तो क्या समझें
ख़ुदा के नाम पे क्या खाते रहते हो क़सम तुम देव,
जुबाँ का फेर है सारा जो ना समझे तो क्या समझें।
-सुनील देव
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55 मिनट पहले

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