उतर गया हूँ गहरे में जब गहरा तो कुछ रहा नहीं।।
दुनियाँ के इस मेले में अब मेरा तो कुछ रहा नहीं।।
जाने कब आ आए बुलावा साँस रुके ये दम निकले
चलना है तो चलो चले अब पहरा तो कुछ रहा नहीं
सबको अपनी पड़ी यहाँ पर कौन किसी को देखे है
सब के सब बहरे हैं जब कोहरा तो कुछ रहा नहीं।
एक समंदर आँख में हैं अब एक समंदर दिल में है,
होठों पे ही प्यास नहीं जब सहरा तो कुछ रहा नहीं
ताज़ा ताज़ा फ़ूल खिले तो लगता हैं गुलशन प्यारा,
हाथों में ही हाथ नहीं जब प्यारा तो कुछ रहा नहीं
उसकी मर्ज़ी वो मुझसे अब बात करे या मुँह फेरे,,
आंखों में ही नूर नहीं जब जारा तो कुछ रहा नहीं।
एक आए हैं एक जाए है सांसों का क्या करना देव
मौसम जैसे लोग मिले सब ठहरा तो कुछ रहा नहीं
-सुनील देव
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