बोझ लिए कांधों पे दिनभर आवारा सा फिरता है।
आदम है या हवा का झोंका मारा मारा फिरता है।
आंखों में इक आस लिए रोज़ निकलता है घर से,
सर पे सूरज आँख में पानी रोज़ ख़सारा करता है।
मिट्टी की जब मूरत है तो मिट्टी में ही दफ़्न करो,,
वरना यूँ तो राह में हरदम इक नज़ारा लगता है।।
अपनी इस सूरत से अब आईना भी अज़ान हुआ,,
राह चलते कोई साथ लगे तो एक सहारा लगता है।
दरिया भी इस रफ़्तार पे है के जाने कहाँ रुकेगा ये,
कोई कस्ती दिख जाए तो मुझे किनारा लगता है।।
आँखें भी भारी है अपनी धड़कन भी ख़ामोश हुई,,
हर कोई चलता दिखता पर दिल ठहरा दिखता है।
सारे शहर में चर्चे है पर अपनी उसे ख़बर ना देव,,
अच्छी मोहब्बत है अपनी भी बस पहरा लगता हैं।
-सुनील देव
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