गुला के रंग पर भवरों का आना लाज़मी तो है।।
किसी की याद में अश्क़ो का आना लाज़मी तो है।
मेरे और उसके दरमियाँ दूरी कितनी हो लेकिन,,
कदम उसकी जानिब बढ़ते जाना लाज़मी ज़मीं है।।
अभी कुछ नहीं बिगड़ा है अभी तो शाम है बाक़ी,,
नम आंखों को अपनी पोछ लेना लाज़मी तो है।।
कई मुश्किलें आती हैं जब नया आगाज़ होता हैं,,
अगर सर पे सूरज है तो धूप आना लाज़मी तो है।
रही ग़म की बारिशें तो ये तो आती जाती रहती हैं,,
अगर सर हाथ हो उसका तो जीना लाज़मी तो है।।
जिसे ना कद्र हैं खुद की उसे क्या फ़िक्र हैं aअपनी,
अगर जीना है दुनियाँ में मुस्कराना लाज़मी तो है।।
नज़र कमज़ोर होना तो देव दौर ए उम्र है लेकिन,
भुलाकर गुजरी बातों को ही जीना लाज़मी तो है।।
-सुनील देव
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