उसकी ख़ुशी के वास्ते क्या क्या नहीं किया।।
कुछ भी किया हमनें मगर रुसवा नहीं किया।।
हाँ ठीक हैं मिला नहीं जो सोचा था आज तक,,
फिर भी किसी दर पे कभी सजदा नहीं किया।।
चाहते तो छीन लाते तुम्हें क़िस्मत के हाथ से,,
लकीरों के खेल में कभी मैं उलझा नहीं रहा।।
शाहों की शोहबतें तो हमें भी पैदाइशी मिली,,
सिकंदर तो रहे ताउम्र मगर ग़ज़्वा नहीं किया।।
क्या उसकी इसकी अपनी बात करते रहते हो,,
खुद से भी हमनें कभी तेरा चर्चा नहीं किया।।
सौदा किया ईमान का ना कभी ज़मीर से गिरा,,
फ़ाक़ा तो कर लिया मगर बलवा नहीं किया।।
इस पार से उस पार की चाहे कितनी हो कमाई,,
जिस मिट्टी में पला बढ़ा उससे दग़ा नहीं किया।।
क्या जान से बढ़कर कोई दुनियाँ में शय है यार,,
शिकायतें तो रही मगर कभी मुजरा नहीं किया
एहसान मुझ पर तेरा भी है हाँ ये मानता हूं देव,,
किसी हाल में रहा मगर कभी तन्हा नहीं रहा।।
-सुनील देव
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