किसी के वास्ते किसी का हो जाना।।
यही है ज़िंदगी किसी का हो जाना।।
ज़िंदगी बोझ क्यूँ लगने लगी है मुझे,,
तू ही कहती थी किसी का हो जाना।।
दूरी कम हो तो उम्मीद रहती हैं कुछ,,
वगरना पड़ता है ज़मीं का हो जाना।।
इक मेरे नाम के यां जाने कितने होंगे,,
जो भी मिल जाए उसी का हो जाना।।
मेरे जैसो को कहां होगी जन्नत नसीब,,
मुझे आता ही नहीं नबी का हो जाना।।
अपनी मर्ज़ी से यां कौन मर्ग चाहता है,,
वो जब चाहे तब उसी का हो जाना।।
याद आये तो आ जाना मिलने को देव,,
वरना राह में बस जबीं का हो जाना।।
-सुनील देव
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