अब तो रोने के दिन आए अब कैसे खुश हो लूँगा।।
दरिया ही जब सूख गया तो कैसे प्यास बुझा लूँगा।।
खाक़ बनू या उड़ जाऊं या किसी कोने में दफ़्न रहूँ,,
मिट्टी ही जब अपनी नहीं तो फिर कैसे जिंदा रहूंगा।।
तुझको कैसा डर है तुझको मिल जाएगी तेरी मंज़िल,
कट गए दोनों हाथ पैर जब तो कैसे अब चल लूँगा।।
क्या चाहा था क्या पाया जब याद करूँ तो दिल रोए,
रहता हो जब बिस्तर गीला तो कैसे अब मैं सो लूँगा।
मुझको ऐसा रोग लगा है कहता मुझसे हर कोई देव,,
इसकी कोई दवा नहीं अब तो कैसे मैं अब जी लूँगा।
-सुनील देव
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