जाने का वक़्त आ गया है फिर इस शहर से।।
नया घर तलाशना है इक फिर नए शहर में।।
लगने लगी है ज़िंदगी भी हमें बेवफ़ा सनम,,
तमाशा बना के रख दिया है बस नए शहर में।।
ये गलियां कूचे घर मकाँ सब कुछ छूट जाएंगे,,
मालूम होता तो कभी ना आते इस शहर में।।
सामान इतना हो गया कहाँ ले जाएं अब इसे,,
या फिर से खरीदना है नया हमें नए शहर में।।
किस किसको साथ रखें किसे छोड़ जाएं अब,,
हर शय सजाई थी बड़े दिल से इस शहर में।।
जा तो रहे हो छोड़ कर पर इतना याद रखना,,
यादें बहुत सताएगी हमें तुम्हारी इस शहर में।।
रोटी के लिए छोड़ आए रोटी के निवाले देव,,
चादर उठाई चल दिए बस इक नए शहर में।।
-सुनील देव
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