आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

दिल ऐसे उलझ रहा हैं अनसुलझे सवाल में।

                
                                                         
                            कितना कुछ बदल गया है इन बीस साल में।।
                                                                 
                            
चेहरे पे कहीं रौनकें तो कोई खस्ता हाल में।१।

जब आए थे तो दिल में थी हज़ारों ख़्वाहिशें,,
कुछ की पूरी हुई तो कुछ रह गए सवाल में।२।

कोई ढो रहा है ख्वाबों की तस्वीर आजतक,,
किसी ने बना लिया है मकाँ पिछले साल में।३।

इक दौर था वो के किराए का घर ढूँढ रहे थे,,,
आज फँस गया है हर कोई अपने ही जाल में।४।

क्या होगा आगे सोचकर अब ज़िंदगी में यार,,
दिल ऐसे उलझ रहा हैं अनसुलझे सवाल में।५।

कुछ तो अभी वहीं है जहां बिछड़े थे एक रोज़,,
कुछ दूर जाके उदास है फ़िराक़ ओ विसाल में।६।

क्या रंग था चेहरे पे जब हम आए थे नए नए,,
सफ़ेदी झलक आयी है आज दाढ़ी के बाल में।७।

घर पहुँचने की आरज़ू में जो साथ छोड़ गए,,
आ जाए वो भी मिलने शायद अब के साल में।८।

परवाह नहीं है कल की देव बस रफ़्तार ना रुके,,
चलती रहे ये रेल यूँही कोई ना फँसे बवाल में।९।
-सुनील देव,
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर