क़ैद हो जाने है एक दिन हम भी यहाँ लहद में।।
कौन पूछेगा हमें फिर के ज़िंदगी कहां अहद में।।
ख़्वाब कितने भी सजा लो पलकों पे तुम दोस्तों,,
टूट तो जाने है एक दिन यहां जिद्द-ओ-जहद में।।
चाँद को भी देखते हो और दाग़ को भी तुम यहाँ,,
कुछ नहीं रह जाएगा तुम देखना यहाँ शैद में।।
क्या ज़रूरी है हमेशा अच्छी नींद आए रात भर,,
जो सुकूँ था बचपने में खो जाएगा यहां वहद में।।
दास्ताने इश्क़ समझो तो के बस इतनी सी बात,,
आज हैं नग़मे तराने और कल यहाँ दिल क़ैद में।।
ख़्वाहिशों के पेड़ भी अब इतने आला मत करो,,
पलकों पे दरिया रखोगे एक दिन यहाँ बे-क़ैद में।।
याद से नहीं वास्ता जिसे देव देखने क्या आएगा,,
चार दिन की ज़िंदगानी अब ज़हर में या शहद में।।
-सुनील देव
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