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दो अंगुश्त ज़िंदगी

                
                                                         
                            कितनो की ही पी गई दो अंगुश्त ज़िंदगी।।
                                                                 
                            
अपनो की ही सताई है दिल-दश्त ज़िंदगी।।

चाहत किसी से ऐसी भी ना करनी थी हमें,,
बस नाम की ही रह गई है मदमस्त ज़िंदगी।।

काबा कलीसे और गिरजा क्या करेंगे अब,,
हैं आबले ज़िगर में और ग़म गश्त ज़िंदगी।।

जिसने किया था क़त्ल वो तो बरी हो गया,,
मरने को रह गई है बस हम-दस्त ज़िंदगी।।

तू कुछ भी कह मुझपे बस इल्ज़ाम लगा दे,,
मेरी तो वैसे भी गुज़र ही गई पस्त ज़िंदगी।।

क्या हुआ गर तू मुझे कभी आया ना देखने,,
सांसों की माला बची है ना बालिश्त ज़िंदगी।।

पलकों पे बोझ लेके यूँ कब तक चलेगा देव,,
अपनी तो आज दफ़्न है यक-लख़्त ज़िंदगी।।
-सुनील देव
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2 महीने पहले

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