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दवा लगा गए।

                
                                                         
                            कभी ज़ख्म कभी गुलाब कभी दवा लगा गए।।
                                                                 
                            
गुज़रे जो लोग इधर से तो क्या क्या लगा गए।।

अब कौन देखता है यहाँ बुजुर्गों को गौर से,,,
पत्थर किसी की आँख में कहीं हवा लगा गए।।

हमको तो ये तसल्ली रही के अपने ही लोग हैं,,
हमें क्या मालूम था के अपना घर ही जला गए।।

एहसान ज़िंदगी का भी कब तक उठाते दोस्त,,
देखा जो आज हाल तो बस पलकें झुका गए।।

महफ़िल उन्हीं की रौनकें भी है उन्हीं की आज,,
ग़म से जो तोड़ राब्ता बस मयकदे में आ गए।।

किस चीज़ के लिए आज तूने जान दे दी यार,,
आँसू छुपा के रखें थे जो मेरे दामन पे आ गए।।

ख़ूब रोया देख कर आज हाल ए जहां को देव,,
कई लोग पराई आग में क्यूँ ख़ुद को जला गए।।
-सुनील देव
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2 महीने पहले

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