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दो पाटों के बीच हमेशा बस सच्चे लोग ही दले गए

                
                                                         
                            जाने कितने लोग आए और आकर यूँ ही चले गए।।
                                                                 
                            
वक़्त के हाथों साँप समझकर रस्सी से ही छले गए।।

पूछे हैं कौन हाल ए दिल किसके पास है वक़्त यहाँ,,
हम भी अपने ज़ख्मों पे बस ज़ख़्मों को ही मले गए।

आएगी इक शाम सुहानी सोचा था बस ताउम्र यही,,
पड़े पड़े अपने बिस्तर पे बस हाथों को ही मले गए।।

कोशिश करने से मिलता गर प्यार तो होते ना बर्बाद,,
चाहत में इक शख़्स की यारों बारिश में ही चले गए।

अब तो ख़्वाबों से नफ़रत है कुछ ना मिला इनसे भी,
यादें ही आबाद रही बस हक़ीकत में सब चले गए।।

दुनियाँ की ये कैसी रीत हैं मिलके हर कोई खो जाए,,
जहाँ भी देखो भीड़ है लेकिन तन्हा ही सब चले गए।

तेरी मेरी बात नहीं ये किस्सा यहाँ हर शख़्स का देव,,
दो पाटों के बीच हमेशा बस सच्चे लोग ही दले गए।।
-सुनील देव
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3 महीने पहले

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