ऐसा नहीं के उसको मैं अब याद नहीं हूँ।।
ये बात अलग है के अभी आबाद नहीं हूँ।।
पुरानी गली से गुज़रा तो याद बड़ा आया,,
मिलने को मिल लेता पर अहबाब नहीं हूँ।।
रस्साकसी में जिंदगी घुटती रही उम्र भर,,
होने को हो जाता दफ़्न पर बर्बाद नहीं हूँ।।
तू दूर से ही देख ले मुझे इतना ही बहुत हैं,,
आ जाना ख़्वाब में ही ख़ाना-ख़राब नहीं हूँ।।
बस्ती जली तो देखना जल जाएगा घर भी,,
मैं भी तेरा जैसा हूँ यार कोई रूदाद नहीं हूँ।।
हलचल हुई तो देखना बहुत याद आऊंगा,,
धड़कन हूँ तेरे दिल की के आज़ाद नहीं हूँ।।
क्या ख़्वाहिशों का ढेर लगा के रखा है देव,,
आ जाऊंगा जब पुकारोगे बरसात नहीं हूँ।।
-सुनील देव,
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