आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

अमीर हम।

                
                                                         
                            उधार की आँखें लिए बन रहे हैं अमीर हम।।
                                                                 
                            
इत्र है गुलाब का और बन रहे हैं अबीर हम।।

उसकी रहमत को कभी याद कर लिया करो,,
सब दिया उसका मगर बन रहे हैं बसीर हम।।

ऐसा क्या दुनियाँ में जो कर नहीं सकता वो,,
ज़र्रे ज़र्रे में वही है और बन रहे हैं नसीर हम।।

आज हम जो कुछ भी हैं सब उसी की नेमतें,,
नूर है उसका ही अंदर बन रहे है शरीर हम।।

ये कभी सोचा है तुमनें क्या दिया उसने हमें,,
कोसते जो रात दिन हैं बन रहे हैं फ़क़ीर हम।।

बस मुझे मालूम इतना कुछ नहीं उसके बिना,,
खामखा ही उड़ रहे और बन रहे असीर हम।।

उसकी मर्ज़ी के बिना यां कुछ नहीं होता हैं देव,,
उसकी ना-वाक़िफ़ी से बन रहे हैं क़सीर हम।।
-सुनील देव
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर