उधार की आँखें लिए बन रहे हैं अमीर हम।।
इत्र है गुलाब का और बन रहे हैं अबीर हम।।
उसकी रहमत को कभी याद कर लिया करो,,
सब दिया उसका मगर बन रहे हैं बसीर हम।।
ऐसा क्या दुनियाँ में जो कर नहीं सकता वो,,
ज़र्रे ज़र्रे में वही है और बन रहे हैं नसीर हम।।
आज हम जो कुछ भी हैं सब उसी की नेमतें,,
नूर है उसका ही अंदर बन रहे है शरीर हम।।
ये कभी सोचा है तुमनें क्या दिया उसने हमें,,
कोसते जो रात दिन हैं बन रहे हैं फ़क़ीर हम।।
बस मुझे मालूम इतना कुछ नहीं उसके बिना,,
खामखा ही उड़ रहे और बन रहे असीर हम।।
उसकी मर्ज़ी के बिना यां कुछ नहीं होता हैं देव,,
उसकी ना-वाक़िफ़ी से बन रहे हैं क़सीर हम।।
-सुनील देव
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