लगी ज़हन में जो आग थी वो आँख से उतर गई।।
कभी ज़िंदगी जो क़रीब थी वो शाख से उतर गई।।
जो ख़्वाब देखें उम्रभर बस ख़्वाब ही सब रह गए,,
हर रात वस्ल ए यार की मिलके शमा से गुज़र गई।
वादाखिलाफ़ी ख़ून की होती तो भूल जाते मगर,,
देके तस्सली आज अपनी वो बात से मुकर गई।।
पहरों पहर जिसे सोच कर होते रहे खुश उम्र भर,,
ज़ख्मों पे ज़ख़्म देके आज वो रिक़ाब पे उतर गई।
बिस्तर भी अपनी नींद का इतना गीला हो गया,,
सोचता ही रह गया के मय आँख से किधर गई।।
गली कूचे दर ओ दीवार से शिकायतें भी ना रही,,
धड़कती थी जो कभी धड़कनें साथ से मुकर गई।।
चलो क़ब्रगाह ही सही कुछ तो मिला है उससे देव,,
कुछ फ़ूल मय्यत पे चढ़ा वो कहकशाँ से भर गई।।
-सुनील देव
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