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तो क्या किसी को भगवान मिलेगा कभी?

                
                                                         
                            दिल के अंदर उठते हैं तूफ़ान कई,
                                                                 
                            
उन्हें अल्फ़ाज़ बनाने में डर लगता है,
किसे सुनाऊँ हाल-ए-दिल अपना,
अब एहसास जताने में डर लगता है।
वक़्त बदला, साल बदले,
रिश्ते बदले, यार बदले,
जिसे कभी अपना समझा था दिल ने,
उसे अब दिल में बसाने में डर लगता है।
तन्हाई से रिश्ता पुराना है मेरा,
फिर भी महफ़िलों में जाने से डर लगता है,
कोई आकर थाम न ले हाथ मेरा,
अब किसी को पास बुलाने में डर लगता है।
कभी मंदिर भी थे अपने,
गुरुद्वारे भी थे अपने,
मस्जिद भी अपनी लगती थी,
सूरज की पहली किरण पर
सुनते थे सुर बस रब के ही।
किस दर पर रखूँ सिर अब अपना,
किस नाम से माँगूँ दुआ,
कहीं पहचान न पूछ ले कोई मेरी,
अब अपना धर्म बताने में डर लगता है।
कभी हम भी भाई-भाई थे,
एक ही आँगन के साए थे,
आज वही आँखों में नफ़रत हैं,
पुराने ज़ख़्मों की परछाईं लिए ।
मैं ढूँढता हूँ गुनाह अपने,
वो सदियों का हिसाब लिए बैठे हैं,
मैं आज की बात करना चाहता हूँ,
वो कल की किताब लिए बैठे हैं।
शहर सिमटकर कमरे हुए,
कमरों के बाहर ताले हैं,
जिन पड़ोसियों को घर से बढ़कर जाना,
आज उन्हीं के दिल काले हैं।
दीवारें ऊँची होती गईं,
आँगन छोटे होते गए,
घर तो सबके अपने रहे,
बस लोग पराए होते गए।
कहीं हिंदू मुसलमान से डरता है,
कहीं मुसलमान हिंदू से लड़ता है,
कहीं सिख को शक की नज़र मिली,
कहीं कोई ईसाई से नफ़रत करता है।
नाम बदल गए, चेहरे बदल गए,
नफ़रत के बहाने वही पुराने हैं,
इंसान मरते देखे हैं हमने,
और ख़ुदा के नाम सुहाने हैं।
इंसानों की इस भीड़ में
इंसान ही ताक लगाए बैठे हैं,
हर हाथ में पत्थर देखा है मैंने,
हर दिल में ख़ंजर छुपाए बैठे हैं।
बेज़ुबानों को देखो तो
मोहब्बत अब भी ज़िंदा है,
कुत्ता वफ़ा में फ़र्क नहीं करता,
परिंदा मज़हब से अछूता है।
उनकी आँखों में प्यार देखकर
ख़ुद को इंसान बताने में डर लगता है,
हम जिन्हें समझदार कहते हैं,
उनकी समझ पर हर्षाने में डर लगता है।
ख़ुदा के दर जाते ही
अपनी हिफ़ाज़त की दुआ करते हैं,
और बाहर क़दम बढ़ाते ही
ख़ुद ख़ुदा की रक्षा के लिए लड़ते हैं।
कैसी अजीब इबादत है ये,
कैसा अजीब ज़माना है,
ख़ुदा को बचाने निकले हैं सब,
और इंसान से ही बचना है।
उम्र ने बहुत कुछ सिखाया है,
हर चेहरा पढ़ना आता है,
कौन अपना, कौन मतलब का,
अब थोड़ा समझ में आता है
मगर इतनी उम्र जीकर भी
एक बात समझ नहीं आई,
इंसान को इंसान रहने में
आख़िर किस बात की लड़ाई?
कभी मोहब्बत बाँटी थी हमने,
अब पहचानें हैं बाँट रहे,
कभी दिल जोड़े थे हमने,
अब सरहदें हैं काट रहे ।
सबका ख़ून लाल है फिर भी,
नाम देखकर रंग बदल जाता है,
इंसान पहले मर जाता है,
मज़हब बाद में याद आता है।
मैंने दुनिया देखी है बहुत,
अब सपनों से भी डर लगता है,
कल शायद कुछ बेहतर होगा
इस उम्मीद पर भी डर लगता है।
नफ़रत इतनी बढ़ गई है कि
मोहब्बत भी गुनाह लगे,
सच इतना अकेला है कि
सच कहना भी ख़तरा लगे।
अब बस एक सवाल बचा है दिल में,
जिसका जवाब कोई देता नहीं
अगर इंसान ही न बचा इस धरती पर,
तो क्या किसी को भगवान मिलेगा कभी?
बहुत जी लिए इस दुनिया में,
मगर ये दुनिया वही रही नहीं,
जिस मिट्टी को अपना कहते थे कभी,
उस मिट्टी में अब वो ख़ुशबू रही नहीं।
मौत का अब कोई ख़ौफ़ नहीं,
न ख़ौफ़ कोई अँधेरों का,
लौ जगे कभी इंसानियत की,
तो हो जाऊँ अमर मैं लगता है।
इस दुनिया तेरी में, ऐ मालिक,
अब लौट के आने में डर लगता है।


 
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2 सप्ताह पहले

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