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माँ — मेरी पहली गुरु, मेरा पहला दोस्त

                
                                                         
                            माँ मेरी पहली गुरु है, माँ ही मेरा संसार,
                                                                 
                            
उसके बिना अधूरा हूँ मैं, वही मेरा आधार।

हर फ़ोन पर पूछे मुझसे, “बेटा, खाना खाया?”
मेरी छोटी-सी ख़ामोशी ने भी उसे बेचैन बनाया।

एक बार फ़ोन न उठाऊँ, तो सौ सवाल करती है,
खुद चाहे कितनी थकी हो, मेरी फ़िक्र पहले करती है।

दिन-रात मेहनत करती है, मेरे सपने सजाने को,
खुद के दर्द छुपा लेती है, मुझे हँसता देखने को।

मैं चुप रहूँ तो आँखों से, मेरा हाल समझ जाती है,
दुनिया चाहे कुछ भी समझे, माँ सब जान जाती है।

जब थककर हारने लगूँ, जब हिम्मत टूटने लगती है,
माँ की आवाज़ सुनते ही, जान में जान आ जाती है।

उसका हाथ सिर पर हो तो, हर मुश्किल आसान लगे,
उसकी गोद में बैठूँ तो, हर दर्द अनजान लगे।

कभी सोचूँ, क्या दे पाऊँगा, उसके प्यार के बदले,
जिसने अपनी खुशियाँ छोड़ीं, मेरे सपनों के लिए।

बस इतनी-सी दुआ है मेरी, माँ तू सदा मुस्कुराए,
मेरे हिस्से के सारे ग़म, तेरे पास कभी न आएँ।

मैं कितना भी बड़ा हो जाऊँ, तेरा बच्चा ही रहूँगा,
तेरी आँखों में आँसू आएँ, उससे पहले मैं सह लूँगा।

माँ, तू सिर्फ़ मेरी माँ नहीं, मेरी ताक़त, मेरा अभिमान है,
तेरे होने से ही मेरी दुनिया, तेरे होने से मेरी पहचान है।
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2 घंटे पहले

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