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मेरी कलम प्रेम लिख नहीं पाती

                
                                                         
                            मेरी कलम प्रेम लिख नहीं पाती
                                                                 
                            

जीवन-पुस्तक को रंगना चाहूँ,
प्रेम-प्रेम बस लिखना चाहूँ।
चाहूँ सब प्रेममयी हो जाए,
हर क्षण सुखद रेखा लाए।

पर प्रेम लिखने पन्ने पर
अब नज़रें झुकाता हूँ,
हाशिए पर कुछ छायाएँ
उभरती पाता हूँ।

छायाएँ...

दलित—सीमित-सी,
आस लगाती असीमित-सी।
उपेक्षा ही बनी जिनकी परिभाषा,
जिनके हाथ अभी चिर निराशा।

तुमने कहा—कब तलक
उनसे नज़रें चुराऊँ?
उनसे नज़रें चुराकर
कब तक विरह-मिलन लिख पाऊँ?

आत्मग्लानि, अपराधबोध से
भरता जाऊँ।
सच पूछो तो
साहित्य है हाशियों की ही बाती।

मेरी कलम
प्रेम लिख नहीं पाती।
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एक महीने पहले

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