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मैं ज़रूर आऊंगा

                
                                                         
                            दुनिया कितनी छोटी हो गई है,
                                                                 
                            
हवाई जहाज ने सिमटा दिया आकाश।
कल तुम यहाँ, परसों वहाँ पहुँच गए,
दूरी का भ्रम अब मिट गया प्रिय।
पर दिलों के बीच जो फासले हैं,
वो अब भी वैसे ही खड़े हैं चुपचाप।
मैं तुममें संपूर्ण प्रकृति को देखता हूँ.
तुम्हारी आँखें अथाह लाल सागर-सी लगती हैं,
जैसे उनमें डूबते सूरज की रोशनी ठहर सी गई हो,
तुम्हारी मुस्कान में हिमालय की विशालता है,
तुम्हारे कानों के दोनों कुंडलें मिस्र के दो पिरामिड-सी प्रतीत होती हैं,
और तुम्हारे चेहरे पर कश्मीर की वादियों जैसी सुकून भरी ठंडक।

कभी-कभी मैं यह भी सोचता हूँ
अगर दुनिया के सभी लोग तुम्हारे जैसे हो जाएँ,
तो शायद यह धरती थोड़ी और कोमल हो जाए,
और दर्द, दर्द न रहकर सुकून बन जाए.

आवाज़ें पहुँचती हैं सरहदों के पार,
लेकिन हर आवाज़ सुनी नहीं जाती,
कुछ पुकारें रास्ते में ही थक कर गिर जाती है,
कुछ दर्द अपने ही भीतर कैद रह जाते हैं।
कभी-कभी करुणा भी रास्ता भटक जाती है,
और हम अपने ही बनाए शोर में
दूसरों की चुप्पी को सुन नहीं पाते।
शायद सुनना कानों का काम नहीं,
बल्कि एक जागते हुए दिल की जिम्मेदारी है।
कहीं रोता है कोई बेआवाज़ दर्द में,
कहीं जलते हैं सपने नफरत की आग में।
ये चीखें अनुवाद नहीं मांगतीं,
ये समझ आती हैं हर इंसान के राग में।

मैं ठहर कर खुद से पूछता हूँ
दुनिया के किसी कोने में बिलखती बच्चियों की चीख
हमारी संवेदना तक पहुँचते-पहुँचते क्यों नम पड़ जाती है?
क्या हमने अपने दिलों के दरवाज़े
इतने कसकर बंद कर दिए हैं
कि मासूमियत की दस्तक भी वापस लौट जाती है?
क्या हमारी आँखें अब आँसू नहीं पहचानतीं,
या हमने उन्हें केवल अपने लिए बचाकर रख लिया है?

कैसा समय है यह,
जहाँ एक पीड़िता की चीख
खबर बनकर गुजर जाती है,
और हम उसे महसूस करने से पहले ही
अगली स्क्रीन पर चले जाते हैं।
क्या सच में हम दानव हो गए हैं?
या हम उससे बचने में माहिर हो गए हैं?
मै उस रुदन पुकार को सुन क्यों नहीं पाता?
ये पुकार मेरे हृदय के लाख टुकड़े क्यों नहीं करते हैं?
ये चीख मुझे हमेशा के लिए अशांत क्यों नहीं करते?

क्या!!
कहीं मेरे कानों में सीसा पिघलाकर तो नहीं डाल दिया गया,
कि मैं सुनना चाहकर भी सुन नहीं पा रहा?
मैं अपना हाथ हवा में उठाकर विरोध क्यों नहीं कर पा रहा,
कहीं मेरा अंगूठा तो नहीं काट लिया गया?
अगर ऐसा है, तो मैं किसी मनु और द्रोण को नहीं छोड़ूँगा,
मैं अपनी छीनी हुई आवाज़ को फिर से गढ़ूँगा,
और अन्याय की हर दीवार को अपने भीतर की आग से तोड़ दूँगा।

मैं अपनी ही चुप्पी के सामने खड़ा हूँ,
और अचानक एक अजीब सी इच्छा जन्म लेती है
काश मैं इस पूरे ग्लोब को अपनी हथेलियों में लेकर
धीरे-धीरे दबा सकूँ,
इतना छोटा कर दूँ
कि कोई भी चीख मुझसे दूर न रह पाए।
हर पुकार मेरे भीतर गूंजे,
मुझे बेचैन करे, मुझे बेआबरू कर दे,
मेरी नींद, मेरी सहजता, यहां तक कि मेरी जान ले लें.
ताकि मैं सचमुच महसूस कर सकूँ
कि दुनिया में क्या घट रहा है?

मैं तुमसे मिलने हड़प्पा कि अंतिम सीढ़ी तक आऊंगा प्रिय!
लेकिन... उससे पहले,
मैं अफ़्रीकी गुलामों से मिलना चाहता हूँ,
यहूदी एवं फिलिस्तीनी मुसलमानों से मिलना चाहता हूँ,
आदिवासियों, दलितों एवं बेजुबानों से मिलना चाहता हूँ,
सारंडा वासियों के पास जाकर उनके दर्द में शामिल होना चाहता हूं,
हाथरस, दिल्ली एवं दुनिया के हर कोने में हैवानियत की शिकार हुई,
मासूम बच्चियों, लड़कियों एवं औरतों के बयानात कलमबद्ध करना चाहता हूं.
ताकि हमारा अग्रिम भविष्य भी परिचित हो,
मानव की अमानवीयता से.
तुम इंतजार करना...
मैं आसमां एवं जमीन एक कर दूंगा,
दक्कन एवं एंडीज का विलय कर दूंगा,
और तमाम विरोधी ताकतों को नेस्त-नाबूद कर दूंगा,
जो आएंगे हमारे मिलन में आड़े
और इन सब के बाद,
पलक झपकते ही मैं तुम्हारी आलिंगन में मिलूँगा,
तुम इंतजार करना, मैं जरूर आऊंगा...
-रुपेश क्रमल
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

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