आजकल किताबों से बहुत दूर हो गया हूँ,
वक्त की उलझन में कुछ मजबूर हो गया हूँ।
चार बजे वाली वह सुहानी भोर कहाँ है?
नींद के आगोश में मैं चूर हो गया हूँ॥
आजकल चार नहीं सूर्योदय के पार उठ रहा हूँ,
दिनभर की भागदौड़ में खुद से ही रूठ रहा हूँ।
याद आते हैं वे पन्ने, मीठी सी महक उनकी,
हर सुब्ह की छांव से मैं दूर छूट रहा हूँ॥
चाहता हूँ लौट आएँ वे सुनहरे पल पुराने,
भोर के सन्नाटे में किताबें गुनगुनाएँ तराने।
सूरज की किरणों संग फिर से आँख खुल जाए,
अक्षरों के संगीतमय हो जाएँ ये बहाने॥
सिर्फ बच्चों का नहीं, हर युवा का ये सिंगार है,
किताबों की छांव में छुपा सच्चा प्यार है।
आधी उम्र हो या हो जीवन की आखिरी बेला,
ज्ञान का यह दीप जलता, हर तम का संसार है॥
रोज एक घंटा जो इन ग्रंथों से बतियाते हैं,
ज़िंदगी के हर सफर को वे आसान बना जाते हैं।
शब्दों की इस दुनिया में जादू सा असर है,
मुरझाए हुए मन में भी फूल नए खिल जाते हैं॥
अब ठान लिया मैंने, फिर से अलार्म जगाऊँगा,
अंधेरे को चीरकर मैं चार बजे ही आऊँगा।
किताबों की महफिल में फिर से वक्त बिताऊँगा,
अपने इस अनमोल सपने को सच कर दिखाऊँगा॥
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