दस बाई छे के इसी कमरे में
एक मेज़ और उसपे पड़ी कुछ काग़ज़ हैं
दीवारों पर ठहरी ख़ामोशी
और खिड़की में थकी सी धूप है
आने-जाने का वही दरवाज़ा
जिसे अब कोई खटखटाता नहीं
कभी-कभी कुछ यादें आती हैं
जैसे धूल उड़े पुराने संदूक से
दो-चार अधूरी सी नज़्में हैं
कुछ अफ़साने जो लिखे ही नहीं
कुछ चेहरे जो मे भूल गया हु
और कुछ नाम जो मिटते ही नहीं
अब यही हाल अच्छा लगता है
ज़माने से बेगाना यही ख़याली दुनिया सच्चा लगता है
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X