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इज़्ज़त का बोझ

                
                                                         
                            आंखों में ख्वाब लिए बड़े शहर जा रही थी।
                                                                 
                            
दो आदमियों की नज़र उससे बार-बार टकरा रही थी।
उसने पहले सोचा चिला देती हूँ, फिर दूसरे ही पल ख्याल आया
कि कैसी बेटी हूँ कि अपने ही माँ-बाप की इज़्ज़त मिट्टी में मिला देती हूँ।
दो दिन में पापा रिटायर हो जाते, मेरे चरित्र पर सवाल उठता
तो कहाँ सर छुपाते।
बस से उतरते समय किसी ने हाथ पकड़ लिया, दुपट्टे का पल्लू अपने हाथों में जकड़ लिया।
अंदर से रो रही थी, पर किसको बताती,
आखिर पापा की इज़्ज़त मिट्टी में मिल जाती।
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3 महीने पहले

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