सिस्टर निवेदिता, स्वामी विवेकानंद
रवींद्रनाथ टैगोर , वैज्ञानिक जगदीश
चंद्र बसु और उनकी पत्नी को एक साथ
एक सभा में लाने में सफल रहीं,
वह दिन था 1899
का शनिवार, 28 जनवरी।
शाम की एक चाय-सभा के
खुशनुमा माहौल में
कोलकाता मे रवींद्रनाथ टैगोर
ने तीन सुन्दर गाने गाए।
उनमें से एक गाना था
"बेला गेलो तोमार पोथ चेये"
(तुम्हारा राह देखते दिन बीत गया),
यह गाना "एशो शांति" (आओ शांति)
शब्दों के साथ समाप्त हुआ।
जब शाम को चाय पर मिले ,
तीन महान हस्तियाँ , एक साधु
एक वैज्ञानिक और एक कवि ,
उस बैठक में शामिल सब लोगों
को कितनी स्वर्गीय शांति मिली होगी।
पूरे गाने का हिन्दी अनुवाद
दिन ढल गया,
मैं तुम्हारा इंतज़ार करता रहा।
सुनसान घाट पर अकेला,
हे नाविक, मुझे पार ले चलो।
मैंने अपनी बांसुरी
एक तरफ रख दी है,
और सारे आँसू और
हँसी पीछे छोड़ दी है;
शाम ढलते ही शरीर से
थकावट छा गई है,
आँखों में नींद छा गई है।
दूर किनारे पर,
हर घर में शाम के
दीपक जल रहे हैं,
और दूर के मंदिर से
आरती का शंख गूँज रहा है ,
आओ, हे थकान दूर करने वाले ,
आओ, शांति और गहरी शांति लाओ।
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