तुम जिस जमी पर हो, मैं उसका खुदा तो नहीं
मैं दूर हूं तुमसे, पर जुदा तो नहीं।
जो तुमने लिखी थी, बात मेरे दिल की कॉपी में
औरों के सामने किताब बनकर खुला तो नहीं।
मैं सह गया हर सितम को दुनिया से छुपा कर
कोई दर्द का शिकवा तुझसे गिला तो नहीं।
जिंदगी की राहों में मिले बहुत सारे,
मैं तुम्हारे सिवा किसी से मिला तो नहीं।
मैं तेरी मुस्कुराहटों और अदाओं पर मरता रहा,
तुम्हारी बाहों को झूला बनाकर झूला तो नहीं।....
-रुपेश परदेशी
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X