वाह रे इंसान तेरे मन की क्या विचार धारा है ?
औरों के प्रति तेरे मन में इतनी नफरत क्यों भरा है?
अपने अंतर्मयी मन में झांक कर देख, हैवानियत तेरे अंदर क्यों पड़ा है ?
औरों के प्रति तेरे मन में इतनी नफरत क्यों भरा है ?
मन की प्रेम से तुम दूर क्यों खड़ा है?
नफरतों से अभी तेरा मन क्या नहीं भरा है?
नफरत की दलदल में क्यों खड़ा है?
नफरतों के दलदल से बाहर आजा,
अपनी जीध पर क्यों अड़ा है?
प्रेम की स्वाद अभी तक तुम क्यों नहीं चखा है?
नफरतों में कहीं कुछ नहीं रखा है?
नज़रें उठा कर देख कहीं बंधु तो कहीं सखा है?
क्यों तेरा मेरा करता है सन्ग किसी के कुछ नहीं जाता है?
तेरे अंदर इतनी क्यों अकड़ है, तेरी बोली में इतनी क्यों कड़क है?
हे मनुष्य क्यों इतना करता है अहंकार?
पल भर में बदल जाती है सरकार,
जीवन में आदर करना सीख ले,
अपने झोली में प्रेम का भीख ले।
दो बातों के बीच में जहर तूने क्यों घोला है?
औरों के प्रति तेरे मन में इतनी नफरत क्यों भरा है?
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