आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

जिस दिन तेरे महफिल में आएंगे

                
                                                         
                            जिस दिन तेरे महफिल में आएंगे,
                                                                 
                            
उस दिन कुछ लोग उठकर महफिल से चले जाएंगे।
कुछ तो बहाने बनाएँगे,कुछ तो अनजाने हो जाएंगे,
जिस दिन तेरे महफिल में आएंगे।
महफिल भी तेरा होगा, लोग भी तेरे होंगे
तालियां भी तेरे होंगे,
लेकिन तालियां मेरे नाम बजाए जाएंगे
जिस दिन तेरे महफिल में आएंगे।
कुछ बेगाने हो जाएंगे, कुछ तो दुश्मन बन जाएंगे,
कुछ तो असर है इन हवाओं में मेरा
जिधर चाहे उधर रुख मुड़ जाएंगे।
जिस दिन तेरे महफिल में आएंगे।
शांत बैठा हूं तो इसका मतलब यह नहीं
की कबूतर भी पर मार जाएंगे।
जब आवाज लगाएंगे, तो तेरे होश उड़ जाएंगे
जिस दिन तेरे महफिल में आएंगे।
तेरे नजरे मिलाने की औकात नहीं,
जब तेरे मेरे मुलाकात हो जाएंगे।
उस दिन कुछ सवालात हो जाएंगे
कौन क्या है सब पहचान जाएंगे?
लगी है आग पुआल में कुछ पल में धुआं बन जाएंगे
बच्ची राख कुछ मिट्टी में, तो कुछ हवा में उड़ जाएंगे।
जिस दिन तेरे महफिल में आएंगे।...... 
-रुपेश परदेशी
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
13 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर