मैं अक्सर तकती हूं ,
कांच की खिड़कियों के उस पार
मेरा तकना ठीक वैसा है, जैसे—
जैसे कोई प्यासा मुसाफिर,
रेगिस्तान की तपती दोपहर में,
दूर कहीं उड़ती धूल के गुबार में,
बादलों के आने का भ्रम पालता है।
जैसे कोई अधूरी लिखी चिट्ठी,
बिना पते के लिफ़ाफ़े में बंद होकर,
डाकिये की आहट पर,
हर रोज़ अपने नाम की पुकार सुनती है
मेरा तकना ठीक वैसे है जैसे ..
जैसे समंदर के किनारे खड़ा कोई दीपस्तंभ,
जो लहरों के शोर में,
खो चुके किसी पुराने जहाज़ की वापसी की,
झूठी उम्मीदें अपनी लौ में संजोता है।
जैसे रात के आखिरी पहर में,
खामोश जलती मोमबत्ती,
हवा के हल्के झोंके को भी,
तुम्हारे आने की आहट समझकर,
बेवजह और भी ज़्यादा पिघलने लगती है।
मैं अक्सर तकती हूँ, कांच की खिड़कियों के उस पार,
जैसे कोई बेजान दीवार,
बरसों से किसी पुराने मौसम का कर्ज चुकाती हो,
और हर सावन की पहली बूंद पर,
अपनी ही सिहरन से खुद ही कांप जाती हो।
जैसे कोई सूखा हुआ दरख्त,
पतझड़ की सूखी शाखों पर भी,
बहार के लौटने की जिद लिए,
खामोश हवाओं से बस सवाल पूछता हो।
जैसे सूटकेस में तह करके रखी गई
तुम्हारी वो खुशबूदार कमीज,
हर बार अलमारी खुलने पर,
तुम्हें गले लगाने का भ्रम पाल लेती हो।
मैं कांच की उस पार नहीं देखती,
मैं तो बस उस धुंधलके में,
तुम्हारी परछाईं ढूंढती हूं,
जो अब भी मेरी यादों की देहरी पर,
अक्सर बिना दस्तक दिए, आकर रुक जाती है।
मैं तकती हूं अक्सर कांच के उस पार,
जहाँ आना तेरा तय था, मुझे छोड़ जाने के बाद।
मैँ जानती हूँ...
कि अब उस पार कोई नहीं,
ना कोई पदचाप है, ना कोई साया,
बस एक धुंध है और मेरा ही अक्स है।
पर क्या करूँ इस दिल का,
जो हर बार कांच पर जमी धुंध को पोंछकर,
वही पुराना अधूरा नाम लिख देता है।
और खुद से ही हारकर,
फिर से इंतज़ार की सीढ़ियाँ चढ़ने लगता है।
मै तकती हु अक्सर कांच के उस पार
मेरा तकना ठीक वैसा है जैसे
तपती धरती को सावन की पहली फुहार।
मै अक्सर तकती हूं कांच की खिड़कियों के उस पार..
-रूपा कुमारी
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X