आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

सुशांत सिंह राजपूत को समर्पित

                
                                                         
                            एक धक्का सा लगा था
                                                                 
                            
जब तुम गए थे..
आज भी दिल रो रहा है
ऐसा क्यों हो रहा है

मैं ही नहीं,
मेरे जैसे लाखों हैं...
जो तुम्हें रोज़ याद करते हैं
जो तुम्हारी,रोज़ बात करते हैं

सोचतें हैं कि काश
तेरह जून को तुमको कह पाते
कि तुम सर्वोत्तम हो
कि तुम किसी से न कम हो

चले गए तुम
हम सबको उदास करके
चलो हमारी छोड़ो,
कभी सोचा, कैसे रहेंगे
तुम्हारे बिना सब लोग, घर के

कितना समय बीत गया
यह ख़ालीपन...
यह अधूरापन, कम ही नहीं होता
तुम्हें इंसाफ मिले,
अब मन यही बोलता
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर