बिन बताए विपदा आती, बिन बताए काल है,
ज़िंदगी की डोर का कब टूट जाए जाल है।
जयपुर की वो आग हो या अहमदाबाद का वो क्रैश,
पल में हंसती ज़िंदगी को कर गया जो राख-ऐश।
कहीं खदान की घुटन है, तो कहीं सैलाब है,
कहीं सड़क-रेल के हादसे, हर तरफ़ कोहराम है।
कहीं गिरा सिलेंडर फटा, कहीं गिरी बिजली विकराल,
मौत तो सच है मगर, आती है लेकर विकट काल।
पूछता है ये समय—क्या तुम खड़े तैयार हो?
सामने जब ढाल न हो, क्या सहोगे वार को?
एक बढ़िया टर्म प्लान ले लो, आज ही यह काम कर,
कल सुरक्षित हो सके, ऐसा कोई इंतज़ाम कर।
बीमा नहीं महज़ एक काग़ज़, यह तो एक वरदान है,
आपके अवर्तमान में भी, यह अपनों का सम्मान है।
हाथ न फैलाना पड़े कल को किसी के सामने,
आएगा यह ढाल बनकर, हर मुसीबत थामने।
बच्चों की छूटे न शिक्षा, घर का आँगन सूना न हो,
ग़रीबी की उस लिस्ट में, अपनों का रोना-धोना न हो।
आज का एक सही डिसीजन, कल की सच्ची छाँव है,
बच्चों की पढ़ाई है, बुज़ुर्गों का वो गाँव है।
बूढ़े मां-बाप का यह हौसला, उनका आत्मसम्मान है,
ज़िम्मेदारी का दूसरा नाम ही, तो यह बीमा महान है।
वक़्त रहते जाग जाओ, मत करो कल की प्रतीक्षा,
तुम रहो या ना रहो, पर बची रहे कुल की सुरक्षा।
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