हिमालय की गोद से निकलती,नदी
अपने साहस से पहाड़ों को तोड़,
सरल भाव से बहती नदी
लेकर चलती वो सबको साथ,
चाहे कंकड़ हो या झाड़।।
बंजर को भी उपजाऊ बनाती,
प्यासे की भी प्यास बुझती।।
कल -कल करके वो बहती,
कहीं पे गहरी कहीं पे उथली।
सदा ही अविरल बहती नदी।
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