जमीन पर बैठकर क्यों आसमान देखता है
पंखों को खोल ज़माना उड़ान देखता है
लहरों की तो फितरत होती है शोर मचानेकी
मंजिल उसी की होती है जो नजरों से तूफान देखा है
हर पतंग जानती है लास्ट में उसे कचरे में ही जाना है
लेकिन उससे पहले हमें आसमान छूकर दिखाना है
घोसला बनाने में हम इतने मशगूल हो गए
उड़ने को पंख है हम यह भी भूल गए
उठो जागो ना रुको तब तक
मेहनत करते रहो लक्ष्य प्राप्त न हो जाए जब तक
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