उम्र आंधी कट गई दूसरों की बात मानने में
कभी एक करो कभी तो करो
दूसरों दूसरों को खुश करने में
जब मेरी बारी आई सहारा मांगने की
तब सब मुकर गए जिम्मेदारी निभाने में
जिनके लिए अपनी ख्वाहिश है हर रोज दबाती रही
उन्हें एक पल न लगा हमें छोड़कर जाने में
अब समझ में आया दुनिया में अपना वही है
जो मुश्किल वक्त में खड़ा रहे समझने में नहीं
निभाने में
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