आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

मुखिया का ताज़

                
                                                         
                            दिल्ली पुलिस के मुखिया को,
                                                                 
                            
मुखिया का ताज़ गवाना पड़ा।
बरत दिए थे जो नरमी,
जंतर मंतर के आंदोलन में।
देख नक्काशी आंदोलन की,
देश के मुखिया बिदक गए।
रातों रात बदल दिये,
दिल्ली पुलिस के मुखिया को।
जो नए मुखिया आये है अब,
कठपुतली बनके नाच रहे।
क्या होगा अब दिल्ली का,
ये तो अब मुखिया ही जाने।
पुलिसिया मुस्कान खिली रहेगी,
या अमानवीय ताज़ खिलाएंगे ।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर